Monday, 29 September 2014

History of Prithviraj Chauhan in Hindi - The Indian Last Warrior

दिल्ली पर राज 

दिल्ली में शाषण तोमर वंश के राजा महाराज अनागपल के हाथों पर था, दिल्ली में प्रथम अनागपल ने तोमर वंश की स्थापना सन 733 में की और उस समय से लेकर लगभग बीस राजाओं ने दिल्ली पर शाषण किया। पृथ्वीराज के नाना दिल्ली में अंतिम तोमर वंश के शाषक थे।

       राजा अनंगपाल के समय की कुछ खास घटना की जानकारी नहीं मिलती है, उनके राज्य की स्थापना की भविष्यवाणी पहले ही की जा चुकी थी, आज जिस जगह पर दिल्ली बसी हुई है पहले यहाँ से दो मील दूर में दिल्ली बसी हुई थी जो की सबसे पहले महाराज युधिस्ठिर ने दिल्ली बासयी थी और समय समय इसका स्थान हर राजाओं द्वारा बदलता चला गया,चंदरबरदाई ने दिल्ली के बारे में लिखा है की जब प्रथम अनंगपाल ने दिल्ली बसाने लगे थे तब उनके कुल के पुरोहितों ने एक खूब लम्बी कील जमीन में गाड़ दी और महाराज से कहा की जबतक ये कील इस जमीन में गडी रहेगी तबतक दिल्ली में तोमर वंश का शासन रहेगा क्योंकि ये कील शेषनाग के माथे से जा लगी है, महाराज अनंगपाल को इस बात पर यकीन नहीं हुआ और उन्होंने वो कील निकलवा कर देखना चाहा जब वो कील निकला गया तब उस कील में सही में खून लगा था, अनंगपाल को इस बात पर बहुत दुःख हुआ की वो बहुत बड़ी बेवकूफी कर गए, फिर उन्होंने दुबारा पुरोहिंतों को बुला कर वो कील जमीन में गढ़वानी चाही पर ऐसा नहीं हो पाया, पुरोहिंतों ने काहा की महाराज मैंने आपका राज्य अचल करना चाहा था पर भगवान् की ही इच्छा नहीं थी अब तोमर वंस के बाद चौहान वंश और फिर दिल्ली में मुसलमानों का शाषन हो जायेगा।

         अब हम पृथ्वीराज के जीवन चरित्र की ओर झुकते है। पहले ही बता चुके है की दिल्ली के शाषक महाराज अनंगपाल की दो पुत्री थी, उन्होंने अपनी कनिष्ठ कन्या कमलावती का विवाह अजमेर के महाराज सोमेश्वर से की थी। परन्तु कुछ इतिहासकारों का मत है की पृथ्वीराज के दादा बीसलदेव ने दिल्ली में आक्रमण कर अनंगपाल को हराया था और इसलिए अनागपल ने दिल्ली और अजमेर के बीच के रिश्तों को मजबूत करने के लिए अपनी कनिष्ट पुत्री कमलावती का विवाह सोमेश्वर राज चौहान से करा दिया था। पृथ्वीराज बचपन से ही कभी अजमेर में रहते थे और कभी दिल्ली में, महाराज अनंगपाल पृथ्वीराज के गुणों पर मोहित रहते थे, उनका कोई पुत्र नहीं था इसलिए उन्हें अपने राज्य के लिए एक योग्य राजा की जरुरत थी, उन्होंने मन ही मन पृथ्वीराज चौहान को ही दिल्ली का महाराज मान लिया था, क्योंकि उन्हें मालूम था की ये भविष्य में एक होनहार मनुष्य होगा। और इसलिए जब वो विर्धावास्था को प्राप्त किये तब उन्होंने बदरिकाश्रम जाकर तपस्या करने के विचार से और दिल्ली का भार उचित हाथों में शौंप कर निश्चिंत होना चाहते थे, इसलिए उन्होंने एक दूत अजमेर भेजकर पृथ्वीराज चौहान को दिल्ली का सम्राट बनाने का नेवता भेजा, इसे सुनकर महाराज सोमेश्वर और पृथ्वीराज चौहान बहुत ही खुश हुए परन्तु जयचंद्र जो की अनागपल का बड़ा नाती था उसका दिल्ली में पहले अधिकार था, इस कारण से दो राज्यों के बीच झगडा हो जाने का बहुत बड़ा खतरा भी था, इसलिए इस विषय पर विशेष विचार की आवश्यकता पड़ी। पृथ्वीराज ने अपने सभी सामंतों को एकत्र कर महाराज अनागपल का पत्र को पढ़ा गया, और खुद पृथ्वीराज चौहान और सभी सामंतों ने अपना यही मत दिया की महाराज अनागपल के इस मत को ठुकराना नहीं चाहिए और इसे अपना कर्त्तव्य समझ कर पृथ्वीराज ने दिल्ली का सिंहासन को स्वीकार कर लिया, एक ओर महाराज अनागपल जहाँ बहुत खुश हुए वहीँ दूसरी ओर जयचंद्र द्वेष की भावना में जलने लगा। 

            “जैसी होत होत्वयता, वैसी उपजे बुद्धि” के अनुसार न तो पृथ्वीराज और न ही उनके सामंतों ने इस बात पर गौर किया इस कारण से पुरे भारतवर्ष में कितनी बड़ी विपदा आ जाएगी, और अगर हम महाराज जयचंद्र की पृथ्वीराज से द्वेष भावना को भारत का अर्ध्पतन का एक भाग कहे तो ये गलत नहीं होगा। कुछ दिन के बाद ही प्रीथ्विराज चौहान ने अपने कुछ शूरवीर सामंतों को साथ लेकर दिल्ली पहुँच गए, दिल्ली को पृथ्वीराज के महाराज बनने के अवसर पर दुल्हन की तरह सजाया गया, उनके पहुँचते ही दिल्ली में उत्सव का माहोल बन गया और सम्बंत 1168 मार्गशीर्ष शुक्ल 5 गुरुवार को पृथ्वीराज चौहान दिल्ली के राज सिंघासन में बिठाये गए, दुसरे ही अजमेर और दिल्ली के संयुक्त सेना ने बड़े ही धूमधाम से पृथ्वीराज चौहान की सवारी निकली, चरों ओर “जय जय पृथ्वीराज चौहान” की ध्वनि से सारा माहोल गूँज उठा। सांयकाल के समय दरबार लगा, पृथ्वीराज राजगद्दी में विराजमान हुए, दिल्ली के प्रधान प्रधान अधिकारीयों ने दरबार में आकर जुहार की और अपनी नजरे दी। उसके दुसरे ही दिन महाराज अनंगपाल ने अपनी धर्म पत्नी के साथ बदरिकाश्रम चले गए, और पृथ्वीराज चौहान निति तथा न्यायपुर्वक दिल्ली का राज्य-शाषण करने लगे।

History of Prithviraj Chauhan in Hindi - The Indian Last Warrior

मुहम्मद गौरी आक्रमण


परन्तु शाहबुद्दीन ने इसे अपना अपमान समझा और पृथ्वीराज चौहान से अपना बदला लेने का ठान लिया। एक बार पृथ्वीराज चौहान लट्टूवन में शिकार खेलने गए थे, जब गौरी को इसबात का पता चला तो उसने उसी समय उनपर आक्रमण कर दिया, पर उसे उस बार भी हार का सामना करना पड़ा, उस समय गौरी किसी तरह भागने में सफल हो गया था। 

कुछ समय के बाद अब पृथ्वीराज नागौर मैं थे, उन्हें ये ससमाचार मिला की मुहम्मद गौरी फिर से आक्रमण करने की फिराक में है, इतना सुनते ही पृथ्वीराजने अपनी सेना एकत्र करना शुरू कर दिया, इस वक़्त पृथ्वीराज के पास केवल 8000 सैनिक थी इसलिए उन्होंने दिल्ली अपने नाना अनंगपाल जी से कहलवा कर 4000 सैनिकों को और मंगवा लिया अपनी साडी सेना को तैयार करने के बाद पृथ्वीराज सारुंड की ओर चल दिए और दुश्मन के आने का इंतज़ार करने लगे, इस समय भारत के इतिहास का काफी भीषण समय था क्योंकि विदेशी भारत पर बार बार आक्रमण कर रहे थे और केवल पृथ्वीराज ही उनका अकेला ही मुकाबला कर रहे थे, इतिहासकार के अनुसार कश्मीर के मुसलमान और पंजाब के कुछ भागो के हिन्दू भी पृथ्वीराज चौहान के विरुद्ध मुहम्मद गौरी का साथ दे रहे थे, एक बात तो बिलकुल ही निश्चित है की एक मात्र पृथ्वीराज चौहान के कारण ही कई वर्षों तक विदेशी भारत की ओर आंख उठा कर भी नहीं देख पाए।

 मुहम्मद गौरी की सेना पृथ्वीराज चौहान की ओर आगे बढती चली आ रही थी, जिसकी खबर पृथ्वीराज को पहले से थी, पृथ्वीराज ने अपना भेदिया भेज कर जानकारी मंगवानी चाही, भेदिया ने उन्हें जानकारी दी की मुहम्मद गौरी तीन लाख सेना के साथ आक्रमण करने के लिए आ रहा है, उनके सेना में गखर, काबुली,कश्मीरी,हक्शी, आदि तरह के सेना है। यद्यपि पृथ्वीराज पर गौरी ने एक बड़ी सेना के साथ हमला किया था और पृथ्वीराज के पास केवल पंद्रह हज़ार ही सेना थी, इसलिए इस बार पृथ्वीराज को गौरी के बहुत बड़ी सेना का सामना करना पड़ा था, इस बार का युद्ध बहुत ही भयानक था , यह युद्ध भी सारुंड के समीप ही हुआ था। जब मुहम्मद गौरी को ये पता चला की पृथ्वीराज के पास थोड़ी सी ही सेना है तो वह बहुत खुश हुआ, और सबसे पहले खुरासानी सेना को आक्रमण करने की आज्ञा दे दी, इस आक्रमण को बचने के लिए लोहाना अजानुबाहू अग्रसर हुई, लोहाना की वीरता से मुसलमान सेना की छक्के छुट गयी।पृथ्वीराज की मदद करने हेतु कान्हा भी नागौर से आ पहुंचा, पृथ्वीराज चौहान की वीरता और युद्ध कुशलता को देखकर दुश्मन अपने होश खोने लगे, कान्हा ने भी बड़ी वीरता दिखाई, मुसलमान सेना पृथ्वीराज,कान्हा,चन्द्र,पुय्न्दीर, की वीरता देखकर सहम गयी और कराह उठी,जो हो इस थोड़ी सी सेना ने ऐसा विचित्र काम कर दिखाया जो की असंभव सा लगता है। छोटे से हिन्दू सेना से मुसलमान सेना हताशत हो रहे थे, हिन्दू सेना यवनी सेना को छिन्न-भिन्न करते हुए मुहम्मद गौरी की ओर अग्रसर हुई, ये देखकर गौरी घोडा छोड़ हठी पर सवार हो गया और यावनी सेना चारो ओर से उशे घेर कर उशकी रक्षा करने लगे। सभी राजपूत वीर अपनी प्राणों के ममता को छोड़ कर युद्ध कर रहे थे उन्हें केवल यवनी सेना के खून की प्यास थी। 

मुहम्मद गौरी को हाथी में सवार देख कर जैतसी की सेना गौरी की तरफ अग्रसर हुई, वह युद्ध करते करते एक ऐसे जगह में जा पहुंचा जहाँ से निकल पाना असंभव था, वो चारो ओर से घिर चूका था, इस समय पृथ्वीराज की दृष्टी जैतसी पर पड़ गयी और उन्होंने अपना घोडा जैतसी की तरफ भगाया, उन्होंने चारों ओर से घेरे हुए यवनी सेना को अकेले ही परलोक भेज दिया, जैतसी ने भी बड़ी बहादुरी दिखायी। यवनी सेना पीछे भागने को मजबूर हो गयी,गौरी फिर से हाथी छोड़ घोडा में बैठ युद्ध करने लगा पर कोई काम न आया। छोटे से हिन्दू सेना के सामने उतनी बड़ी मुसलमान सेना पीठ दिखाने को मजबूर हुई, गौरी भी उनके साथ भागा, परन्तु पृथ्वीराज के मना करने पर भी जैतसी ने गौरी का पीछा कर उसे पकड़ लिया और पृथ्वीराज के चरणों में लाकर पटक दिया। 

गौरी को फिर से बंदी बना लिया गया। पृथ्वीराज ने इन सभी झमेलों से निश्चिंत होकर इच्छन कुमारी से विवाह किया और इस आनंद के मौके पर गौरी को धन देकर छोड़ दिया। परन्तु स्त्रियौ के सम्बन्ध में पृथ्वीराज की अभिलासा जैसे जैसे पोरी होती जाती वैसे वैसे और बढ़ती जा रही थी। एक वर्ष के बाद ही पृथ्वीराज इच्छन कुमारी से ट्रिप हो गए और दूसरी की आवश्यकता आ पड़ी। इसी बीच उनकी नज़र कैमाश की बहन पर जा पड़ी, और शादी करने की इच्छा जताई, कैमाश के पिता ने उनकी बातें मान ली और अपनी दोनों पुत्रियों का विवाह करवा दिया साथ ही कई आदमियों की जान की रक्षा की।


History of Prithviraj Chauhan in Hindi - The Indian Last Warrior

मुहम्मद गौरी

पृथ्वीराज चौहान की उम्र अब सोलह वर्ष की हो चुकी थी इस समय वे नागौर के पास अट्टूपुर में शिकार खेल खेल रहे थे। इसीसमय मीर हुसैन नाम का एक गजनवी मुसलमान जो चंदरबरदाई के अनुसार मुहम्मद गौरी का चचेरा भाई था, चित्ररेखा नाम की एक वैश्या को साथ लेकर अपने साथ लेकर आ पहुंचा बात ये थी की चित्रलेखा वैश्या होने के साथ साथ बहुत ही गुणवती थी। वह सुन्दर होने के साथ साथ विणा बाजाने, गान विद्या आदि में भी बहुत निपुण थी। शहाबुद्दीन चित्रलेखा को बहुत चाहता था। शाहबुद्दीन उतना गुनी नहीं था पर मीर हुसैन गुनी होने के साथ साथ बहुत ही सुन्दर भी था, जब शाहबुद्दीन को उसके और चित्रलेखा के प्रेमप्रसंग के बारे में पता चला तो उसने उन्हें डरा-धमकाना चाहा। 

इसलिए मीर हुसैन, चित्रलेखा के साथ पृथ्वीराज चौहान की अजमेर नगरी आ पहुंचा। पृथ्वीराज चौहान ने जब विदेशी को अपने नगर में देखा तो उसने अपने सामंतों से विचार विमर्श करना उचित समझा, और अंत में पृथ्वीराज ने ये फैसला किया की क्षत्रिये धर्म के अनुसार शरणागत में आये हुए को ठुकराया नहीं जाता, और उन्होंने उसे आश्रय दे दिया, अतः पृथ्वीराज ने उसे अपने सभा के दाहिने ओर स्थान दिया और उसे बहुत ही सम्मान भी दिया। चन्द्रबरदाई के अनुसार पृथ्वीराज से गौरी के बैर का कारण यही था, लेकिन अन्य इतिहासकारों की माने तो गौरी भारत केवल लूट मार करने के लिए आया था उन्होंने किसी भी वैश्या के बारे में कोई जिक्र नहीं किया है। अगर चन्द्रबरदाई का कारण सही है तो ये बात माननी पड़ेगी की एक वैश्या के कारण घोर अनर्थ हो गया। शहाबुद्दीन ने अपने भाई के पीछे एक गुप्त भेदिया भी चोर रखा था ताकि वो ये जान सके की भारतवासी उसके साथ कैसा बर्ताव करते है, उसके गुप्तचर ने देखा की पृथ्वीराज चौहान उसे बहुत इज्जत के साथ रखा हुआ है, और ये सारा हाल मुहम्मद गौरी को जाकर सुना दिया, ये सुनते ही उसने अपने सरदारों के साथ विचार करने लगा, ये सुनकर उसने अपने एक सरदार ततार खां को अजमेर भेज दिया, और कहलवा दिया की अगर तुम चित्रलेखा को लौटा देते हो तो तुम देश में आकर रह सकते हो, ततार खां ने मीर हुसैन को बहुत समझाना चाहा पर वो एक नहीं माना, अंत में वो हार मानकर पृथ्वीराज को मुहम्मद गौरी का वो पत्र दे दिया जिसमे लिखा था की “ तुम मीर हुसैन को अपने राज्य से निकाल दो वरना मैं तुम पर आक्रमण कर दूंगा, इतना सुनते ही पृथ्वीराज चौहान के साथ साथ सारे सामंत क्रोधित हो उठे और एक स्वर में कह उठे “शरणागत को त्यागना क्षात्र धर्म के विपरीत है, मुहम्मद गौरी जो चाहे कर ले हम मीर हुसैन को नहीं निकल सकते है “। आखिर का उस ततार खां को लचर होकर वहां से जाना पड़ा। वह गजनी पहुँच कर सारा हाल गौरी को सुनाया, इतना सुनते ही गौरी ने अपने सभी सरदारों को बुला भेजा और पृथ्वीराज से अपने अपमान का बदला कैसे लिया जाए इस पर विचार विमर्श होने लगा। 

ततार खां ने भारत पर आक्रमण करने की राय दी पर इस पर खुरासान ने ये राय दी की हम भारत को जानते नहीं है इसलिए इस समय अकर्मण करना उचित नहीं होगा क्योंकि शत्रु को जाने बगैर युद्ध करने में कोई बुद्धिमानी नहीं है, इतना सुनते ही उसके दूत भी बोल उठे की हाँ ये बात सत्य है क्योंकि पृथ्वीराज, उसके सामंत और उसके सैनिक कोई साधारण पुरुष नहीं है, गौरी कुछ देर तक शांत बैठा रहा फिर अपने दूत से बोला तुम तो भारत गए हो न तुम मुझे भारत के बारे में बताओ, दूत ने उसे भारत के बारे में बटन शुरू किया की संसार में भारत जैसा कोई दूसरा देश नहीं है, यहाँ सुन्दरता का भंडार है,यहाँ की भूमि उर्वरता से भरी पड़ी है, यहाँ में कई महल है जिसकी सुन्दरता का वर्णन मैं बोल के नहीं कर सकता है, यह देश जन, संपत्ति और वैभव से भरी पड़ी है, इसपर गौरी ने कहा की तब तो ये देश धर्म प्रचार के लिए बहुत ही सही है,इतना कह कर वो चुप हो गया, इसके बाद उस दूत ने कहा कि मैं लगभग आधा भारत घूम चूका हूँ मैंने कोई भी तीर्थ स्थल नहीं छोड़ा है, पर वहां एक बात मुझे देखने को मिली है की वहां पर हिन्दू समाज कई भागों में बंटा हुआ है ब्राह्मण, क्षत्रिय, शुद्र आदि मैं सबसे मिला पर वो सब अपने काम में अद्भुत है,अगर मैं दूसरी शब्द में कहूं तो भारत एक जन्नत है, इसपर गौरी ने कहा की तो फिर उस जन्नत से लौट क्यों आये? इसपर उस दूत ने कहा की मैं तो बस यहाँ पर आपको रास्ता दिखाने के लिए आया हूँ बिना मुश्लिम धर्म के प्रचार किये उस देश की उन्नति नहीं हो सकती है। पर ये बात है की हिन्दुओं की सकती असीमित है उन्हें पराजय नहीं किया जा सकता, वहां की प्रजा तो अपने राजा के प्रति इतनी भक्त है की उसके एक आदेश से वो जहर तक पी लेते है अतः आप हिंदू को कमजोर न समझे इतना कहकर वो दूत शांत हो गया। गौरी ने कहा की मानता हूँ की ये सब ठीक है पर हिन्दुओं में जितनी वीरता है उतनी ही उनमे फूट भी भरी पड़ी है, इसलिए मैं इन बैटन पर विचार नहीं कर सकता, विचार करने की बात तो ये है की कासिम ने केवल बीस वर्ष की उम्र में ही हिन्दुओं पर विजय प्राप्त की थी। 

महमूद ने भारत पर अठारह बार आक्रमण किया तब हिन्दुवों की ताकत कहाँ चली गयी थी,उनके पास ताकत अवश्य थी पर कुसंगत और कुविचार उनमे उस समय भी भरी पड़ी थी, कासिम में जब देवलपूरी पर आक्रमण किया था तब हिन्दुओं ने कहा था की जब तक उनके मंदिर पर ध्वजा लहराती होगी तबतक उन्हें कोई नहीं हरा पायेगा,कासिम ने सबसे पहले उस ध्वजा को ही काट दिया और तब हिन्दुओं ने ये सोच लिया की अब उनकी हर निश्चित है और बिना परिश्रम के ही कासिम ने उनपर विजय प्राप्त कर ली थी, इतिहास से ये साबित होता है की हिन्दोवों को हराया जा सकता है और और भारत में मुसलमान धरम प्रचार संभव है। इसके बाद गौरी ने अपने सभी सरदारों की सहमती ली और इस्लाम धर्म के प्रचार हेतु भारत पर आक्रमण करने का फैसला लिया गया।



History of Prithviraj Chauhan in Hindi - The Indian Last Warrior

सोमेश्वर और भीमदेव वध

भीमदेव पृथ्वीराज के बढ़ते प्रक्रम से बहुत ही दुखी था वो पृथ्वीराज चौहान पर आक्रमण करने की सोच रहा था जब ये बात पृथ्वी के कानो तक पहुंची तब उन्होंने अपने सब सामंतों को एकत्र किया और युद्धनिति बनाने लगे, इसी समय लोहाना पांच हज़ार सैनिक लेकर अजमेर आ पहुंचे चामुन्द्राय, जयतव राय देवराय बग्ग्री सभी ने अपनी युद्ध की सहमत्ति दिखाई। पृथ्वीराज चौहान ने अपने सेना को दो भागों में बनता एक का सेनापतो कैमाश को नियुक्त किया और दूसरा की बागडोर खुद के हाथों में रखी। अब वे युद्ध की लिए निकल पड़े। पृथ्वी की सेना ने भीमदेव के सेना पर इस वेग से आक्रमण किया की भीमदेव के सेना की पाँव उखड गए उन्हें आबू चोर कर भागना पड़ा और इस तरह से आबू पर पृथ्वीराज चौहान का अधिकार हो गया। चंदरबरदाई के अनुसार यह युद्ध विक्रम सम्बत 1164 में आधी रात के समय हुई थी इसमें दोनो ओर से 16000 सेना मारी गयी थी 13000 भीमदेव की और 3000 पृथ्वीराज की।

भीमदेव बार बार पृथ्वीराज से अपमानित होने के कारण उतीजित हो रहा था, जब उससे रहा न गया तो अपने सभी अधीन राजाओं और सामंतों के साथ मिलकर अजमेर पर धावा बोल दिया जब ये समाचार सोमेश्वर जी के कानो तक जा पहुंचा तब उनसे रहा न गया और एक वीर पुरुष के भांति उन्होंने भी युद्ध का आमंत्रण दिया। इस युद्ध में जयचंद्र ने अजमेर का साथ नहीं दिया क्योंकि पृथ्वी के बढ़ते पराक्रम को देखकर दिल्ली के महाराज अनानाग्पाल ने सोमेश्वर जी के सामने यह प्रस्ताव रखा था की पृथ्वी को दिल्ली का महाराज बना दिया जाए, इससे कन्नोज के राजा बहुत अप्रसन्न हुए थे क्योंकि बड़े नाती होने के कारण दिल्ल्ली पर पहले उनका अधिकार था, पर उन्होंने पृथ्वी को चुना था। उस समय पृथ्वीराज अजमेर में नही थे इसलिए सोमेश्वर राज चौहान अपनी वीर राजपुतों के साथ भीमदेव का मुकाबला करने चल दिए, उन्होंने उसे रोकना चाहा, बहुत भयानक युद्ध हुआ पर अंत में तीन सौ सैनिकों के साथ सोमेश्वर राज चौहान भी मारे गए। जब ये समाचार पृथ्वीराज के पास पहुंचा तो वो क्रोध से अधीर हो गए और उसी समय उन्होंने ये प्रतिज्ञा ली की जब तक वे भीमदेव से इसका बदला नहीं लेंगे तब तक वे किसी तरह का राजसुख को हाथ नहीं लगायेंगे, वो न ही पगड़ी बांधेंगे न ही घी खायेंगे। उन्होंने गुजरात पर आक्रमण करने का अनुमति दे दिया पर सामंतों ने उन्हें समझाया की पहले अजमेर का राज्याभिषेक हो जाना चाहिए, पृथ्वी ने उनकी बात मान ली, भीमदेव दांत पीस कर ही रह गया क्योंकि उसके इतने कोशिश करने पर भी वो अजमेर को हासिल न कर पाया। पृथ्वी का राज तिलक इधर हो गया।

सोमेश्व्वर राज की मृत्यु के बाद से ही पृथ्वी बहुत ही अधीर हो रहे थे उनके दिल में कांटे सा चुभने लगा। कुछ दिन सोच विचार करने के बाद उन्होंने भीमदेव पर आक्रमण करने का फैसला किया। पृथ्वीराज ने आपने सेना लेकर गुजरात के सीमा पर आ पहुंचा, भीमदेव के दूतों ने उन्हें खबर दिया की पृथ्वी अपने 64000 सेना लेकर गुजरात पर आक्रमण करने आया है। यह समाचार सुनकर उसने तुरंत ही एक लाख सेना एकत्र कर पृथ्वीराज से युद्ध करने निकल पड़ा ।पृथ्वीराज की सेना कुछ दूर रह गयी थी उन्होंने चंदरबरदाई को एक लाल पगड़ी और एक चोली देकर भीम देव के पास भेज दिया और ये कहलवा दिया की अगर वो चोली पहन कर युद्ध मैदान में आकर पृथ्वीराज के सामने घुटने टेके तोह ही उश्के प्राण बाख सकते है अन्यथा वो ये लाल पगड़ी बांध कर युद्ध मैदान में आ जाये ताकि उसके सहायको सहित उसके पिता के नाम उश्का रक्त नदी में बहा कर तर्पण किया जायेगा। चंदरबरदाई ने चलते समय एक खेला खेला उसने अपने गले में एक जाल,हाथ में एक कुदाल,दुसरे हाथ में दीपक, और एक सीढ़ी लेकर भीमदेव के इलाके पट्टनपुर पहुंचा, इसे देखकर हजारों की भीड़ उसके साथ हो ली, वह अब राज दरबार पहुंचा, भीमदेव चंदरबरदाई को पहचानता था उसे देखते ही उसने पूछा कहो चाँद ये कैसा स्वांग रचे हो, चन्द ने कहा पृथ्वी कहता है की अगर तुम उसके दर से आकश में छिप जोगे तो वो तुम्हे इस सीढ़ी से दूंढ़ कर मर डालेगा, अगर तुम उसके डर से समुन्द्र की गहराई में छिप जोगे तो वो तुम्हे इस जाल से पकर लेगा, आगर जमीन में छुप जावोगे तो ये कुदाल से खोद कर निक्कालेगा अगर तं उसके डर से कहीं अँधेरे में छिप जावोगे तोह ये दिए से खोज निकलेगा, अगर तुम्हे अपनी प्राण प्यारी है तो ये चोली पहन कर युद्ध में आ जाओ या फिर ये लाल पगड़ी बाँध कर युद्ध मैदान में आ जाओ। भीमदेव ये सुनकर बहुत क्रोधित हुआ और चाँद को वहीँ मार देना चाहा पर अपने राजपूत गुण के कारण किसी कवी पर हाथ उठाना सही नहीं समझा। उसने युद्ध की आज्ञा दे दी इधर पृथ्वीराज तैयार थे ही। आज के युद्ध में नित्ठुराय को सेनापति बनाया गया, और कान्हा के आंख की पट्टी भी खोल दी गयी। उसके आँख की पट्टी खुलते ही वह अपने शत्रु पर टूट पड़ा और इस वेग से आक्रमण किया की दुश्मन के पाव उखरने लगे उसका सामना करने के लिए मकवाना का पुत्र आगे बढ़ा,, और कान्हा के हाथों मारा गया। मकवाना के पुत्र के मरते ही भीमदेव की सेना थोडा दब गयी पर युद्ध बंद नहीं हुई, इसी समय सारंगराय ने जोर से आक्रमण किया और चौहान सेना का दन्त खट्टा करने लगा ये देख कर पृथ्वीराज चौहान स्वयं घोड़े में बैठ कर युद्ध करने लगे उनके युद्ध मैदान में आते ही चौहान सेना में फिर से वही जोश आ गयी और भीमदेव के सेना को पीछे धकेलने लगी, संध्या का समय होने लगा और बहुत सारे वीर दोनों दलों के मारे जाने लगे।इसी समय भीम देव का सामना पृथ्वी राज से हो गया, दोनों दलों की सेना की तलवार की गूँज से सारा माहौल थर्रा उठा। भीमदेव को पृथ्वीराज ने एकाएक ऐसा वार किया की उसका सर दूर जाकर गिर गया। भीमदेव की मरते ही चारो ओर पृथ्वीराज की जयजयकार होने लगी। सारी गुर्जर सेना पट्टनपूरी की ओर भागने लगी, इस युद्ध में पृथ्वीराज की ओर से 1500 घुड़सवार, पांच सौ हाथी, और पांच हज़ार सिपाही काम आये। 

इसके बाद पृथ्वीराज ने भीमदेव के पुत्र वनराज को गुजरात की गद्दी पर बिठाया और खुद वहां से अजमेर की ओर लौट आये।


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भीमदेव का आबू पर विजय

उनके इस वीर गाथाओं के कारण ना जाने कितने प्रसन्न हुए और न जाने कितने ही दुखी। दुखी होने वालों में से एक था भीम देव सोलंकी। भीमदेव का एक भाई था सारंगदेव और सारंगदेव का आठ पुत्र थे। जब सबसे बड़ा बेटा पिता की गद्दी पर बैठा तो उसने कई तरह से अपनी प्रजा को कष्ट पहुचने लगे इसे देखकर भीमदेव बहुत अप्रसन्न हुए, इसका परिणाम ये हुआ की प्रताप सिंह अपने सातों भाइयों को अपने साथ मिला कर भीमदेव का खुलमखुल्ला भीम देव का विरोधी बन गया और राज्य में लूट मर मचाने लगा, अंत में भीमदेव ने इन्हें रोकने के लिए अपनी सेना से काम लेना शुरू किया अब दोनों पक्ष एक दुसरे को हानि पहुचाने का काम करने लगे । एक बार भीमदेव की सेना एक नद्दी के किनारे पड़ाव डाली हुई थी भीमदेव का फीलवान उनके हठी को लेकर नदी में स्नान करवाने ले गया था प्रताप सिंह के भाइयों ने फीलवान और उश्के हाथियों को वही मार डाला इससे भीमदेव ने उनके साथ बहुत बुरा व्यवहार किया अपनी इस दुर्व्यवहार के कारण वे लोग और इस राज्य में रुकना ठीक नहीं समझे और सातों भाई पृथ्वीराज चौहान के दरबार में चले गए। शरणगत के प्रतिपालन से एक राजपूत कभी मुंह नहीं मोड़ सकते इसलिए वे उन्हें दरबार में ही रख लिए। पृथ्वीराज ने उन्हें वहां रख तो लिया पर उनका वहां निर्वाह नहीं हो पाया, केवल मुछ पर ताव देने पर कान्हा ने उन सात भाइयों का सर काट दिया। कान्हा के इस व्यवहार से पृथ्वीराज बहुत दुखित हुए पर वो इतने साहसी और वीर योद्धा को खो नहीं सकते थे। इस कारण से कान्हा सात दिन तक दरबार में नहीं आये लेकिन पृथ्वीराज ने उन्हें दरबार में बुला कर कान्हा के आंख में पट्टी बाँध दी ताकि वो किसी और को मुछ पर ताव देते हुए न देख सके ये पट्टी केवल नहाने समय, सोने समय और युद्ध के समय खुलती थी। जब भीमदेव के पास प्रताप सिंह के सातों भाइयों की मौत का खबर मिला तब ये इर्ष्या की आग और भी धधक उठी अब उश्के पास प्र्रिथ्विराज को निचा दिखाने का एक अवसर मिल गया था, भीमदेव ने अजमेर पर हमला करने की सोची पर वर्षा ऋतू के शुरू हो जाने के कारण वो ऐसा कर न सका। गुजरात का राजा भीमदेव बहुत ही प्रकर्मी था। उसने अपनी पत्नी के सहेलियों चन्द्रावती से आबू के राजा इच्छन कुमारी की चर्चा सुनी थी अब वो उससे शादी करने को ठान लिया उसने राजा सलख को उशकी पुत्री से विवाह करने के लिए पत्र लिख दिया पर पत्र इतने गर्वित शब्दों में लिखा गया था की राजा सलाख ने इसे अपना अपमान समझा और बड़े ही नम्र अक्षरों में लिखा की वो उनकी पुत्री का विवाह पृथ्वीराज से तय कर चुके है आपको इस विषय में जिद नहीं करनी चाहिए। बातों ही बातों में बात इतनी ज्यादा बढ़ गयी की भीमदेव बहुत क्रिधित हो गया वो राजा सलख को डरा धमका कर चला गया उस्क्व जाते ही राजा सलख ने सोमेश्वर को सारी बातें बता दी और ये भी लिखवा कर भेजवा दिया की शादी जल्द से जल्द हो जानी चाहिए। उस समय पृथ्वीराज दिल्ली में अपने नाना जी के पास थे, इधर भीमदेव ने पृथ्वीराज को पत्र लिख कर समझाना चाहा की वो उनके और इच्छन कुमारी के रास्ते से हट जाए, इधर उसने ये पत्र पृथ्वीराज को लिखा और एक तरफ उशने अपने अधिन राजाओं के साथ मिलकर आबू पर आक्रमण कर दिया। राजा सलख पहले से ही सावधान था उन दोनों राज्यों में बहुत देर तक युद्ध हुआ, परन्तु सारे सरदारों के साथ राजा सलख मारा गया। और इस तरह से आबू पर भीमदेव का अधिकार हुआ।


Sunday, 28 September 2014

History of Prithviraj Chauhan in Hindi - The Indian Last Warrior

रानी इंदिरावती

अजमेर के राजकुवर पृथ्वीराज चौहान और चितोड़ के राजकुवर समर सिंह के बीच बहुत ही घनिष्ट मित्रता थी। अपने बढ़ते वैभव के कारण उज्जैन के महाराज ने अपनी पुत्री का विवाह पृथ्वीराज से करवाना चाहा, उन दिनों पृथ्वीराज उज्जैन के पास ही शिकार खेल रहे थे। कुल पुरिहितों ने पृथ्वीराज का टिका चढ़ा कर विवाह का बात को पक्का कर लिया इसी बीच उन्हें ये सूचना मिली की गुजरात के राजा भीमदेव ने चितोड़ पर आक्रमण कर दिया है, इसलिए अपने संबंधो के कारण एवं मित्रता का कर्त्तव्य समझ कर समरसिंह की सहायता के लिए चितोड़ अग्रसर हुए। राह में ही पृथ्वीराज की भेंट समरसिंह के ड्डोत से हो गयी उसने पृथ्वीराज को बताया की दस कोश की दूरी पर ही भीमदेव की सेना पड़ाव डाले हुए है और शीघ्र ही दोनों दलों में मुटभेड हो जाएगी। उसने यह भी कहा की समरसिंह के आज्ञा अनुसार वो आपको ही इसकी समाचार देने के लिए आ रहा था। अभी भीमदेव ने आक्रमण किया भी न था की पृथ्वीराज चौहान ने अपने सेना लिए समरसिंह के पास जा पहुंचे। उन्होंने एकाएक बिना विश्राम किये गुजरात की सेना में आक्रमण कर दिया, अब लचर होकर भीमदेव को अपनी सेना का मुह फेरना पड़ा। समरसिंह और पृथ्वीराज की संयुक्त सेना ने भीमदेव पर भीषण आक्रमण कर दिया पर भीमदेव की सेना अपनी स्थान से न हटी। समरसिंह और पृथ्वीराज ने बहुत वीरता दिखाई। युद्ध होते होते शाम हो गयी पर कुछ भी निर्णय न हो पाया। दुसरे दिन भी युद्ध आरंभ हो गया। आज भीमदेव ने नदी पार कर स्वयं चितोड़ की सेना पर आक्रमण किया, परन्तु वीर समरसिंह ने इस वेग से उसके आक्रमण को रोका की गुजरात की सेना के छक्के छूट गए। पीछे से पृथ्वीराज की सेना ने भी आते हुए गुजरात की सेना में मार काट मचा दी। आज दिन भर के युद्ध में भीमदेव के दस सेनानायक मारे गए। इतने पर भी गुजरात की सेना अपने स्थान में डटी रही पर पृथ्वीराज और समरसिंह एवं उनके वीर सामंतों ने ऐसी वीरता दिखाई की गुजरात की सेना को पीछे हटना पड़ा, गुजरात की सेना पराजित हुई, और भीमदेव वापस गुजरात चली गयी, परन्तु पृथ्वीराज कुछ और दिन चितोड़ में ही रुक गए। भोलाराय भीमदेव केवल भाग जाने का बहाना ही किया था, वह रणभूमि से हटकर कहीं छिपा रहा और एक दिन जब पृथ्वीराज अपने शिविर में सो रहे थे तब अर्धरात्रि के समय आक्रमण कर दिया। इस आकस्मिक आक्रमण से वे उठ खड़े हुए और जिस अवस्था में थे उसी अवस्था में युद्ध करने लगे। आज रात का युद्ध में जैतसी का छोटा भाई, लखी सिंह, वीर बगरी, रूप धन आदि सरदार मारे गए, परन्तु विजयलक्ष्मी पृथ्वीराज को ही जीत का हार पहना गयी और भीमदेव के तरफ से मेरपहाड़ नामक नामी सरदार समेत पांच हज़ार सैनिक इस युद्ध में मारा गया। अब भीमदेव को वास्तव में हार मानना पड़ा और गुजरात वापस जाना पड़ा। पृथ्वीराज स्वयं समरसिंह की सहायता के लिए चितोड़ में रुके हुए थे और इधर इंदिरावती से विवाह का दिन भी आ गया, पृथ्वीराज ने अपनी तलवार पन्न्जुराय को देकर इंदिरावती से विवाह कर लाने के लिए भेज दिया क्योंकि उस समय यह रिवाज थी की यदि किसी कारणवश वर स्वयं बारात में नहीं आ सकता था तो कोई वर का साथी वर का कटार लेकर विवाह रचाने जा सकता था। जब पंज्जुराय ने पृथ्वीराज के स्थान पर विवाह के लिए गया तो उज्जैन के राजा ने कहा कि मुझे ऐसे मनुष्य से विवाह नहीं करनी है जो स्वयं विवाह में न आ कर युद्ध में चला जाए, चंदरबरदाई ने उन्हें बहुत समझाने की कोशिश की पर उज्जैन के महाराज ने एक न मानी, परन्तु उन दोनों के कुछ झमेला करने पर उज्जैन के महाराज ने उन्हें पांच दिन का समय दिया। इंदिरावती ने भी सारी बातें सुनी उसने ये प्रतिज्ञा कर ली की वो शादी करेगी तो केवल पृथ्वीराज चौहान से ही। परन्तु जब पांच दिन की अवधि जब निकल गयी तब उज्जैन के राजा क्रोधित होकर पृथ्वीराज के सामंतों को निकल जाने का आदेश दे दिया, पृथ्वीराज के सामंत क्रोधित हो उठे और युद्ध की तयारी करने लगे, तुरंत ही युद्ध होने लगा पृथ्वीराज के वीर सामंत ने उज्जैन के राजा को पकड़ कर अपने वश में कर लिया। उज्जैन के राजा की आंखे खुल गयी और उसने बड़ी धूम धाम से अपनी पुत्री का विवाह पृथ्वीराज के भेजे हुए साथी से कर दिया, और इस प्रकार ये झमेला शांत हुआ। वो उसे लेकर अजमेर आ गए। थोड़े ही समय में पृथ्वीराज ने रणथम्भ के राजा की कन्या हंसावती से भी विवाह कर लिया।

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मेवात पर आक्रमण

सोमेश्वर राज चौहान ने पृथ्वीराज और जमावती के विवाह के बाद अपना ध्यान फिर से राज्य विस्तार की ओर लगाया। उष समय अजमेर में शांति विराज कर रही थी, प्रजा में किसी तरह का आसंतोष न था। सोमेश्वर राज चौहान शांति के विरोधी न थे जब बातों से बिलकुल भी काम नहीं निकलता था तभी केवल वो शस्त्र का प्रयोग करते थे। उस समय मेवात के राजा मुद्गलराय सोमेश्वर के अधीन थे पर फिर भी वे उनको कर नहीं देते थे इस पर सोमेश्वरराज ने उश्के पास अपना दूत भेजवा कर समझाना चाहा पर वो नहीं माने। अंत में लाचार हो कर उन्हें अक्रामण करना पड़ा परन्तु वे मेवात के सीमा पर जा कर रुक गए वे ये सोचने लगे की बिना कारण ही इतने सारे मनुष्यों का संहार हो जायेगा यदि बातों से ही काम निकल जाता तोह अच्छा होता इसलिए सीमा पर उन्होंने फिर से अपना एक दूत भेज कर उन्हें समझाना चाहा पर मुद्गलराय ने एक न मानी। सोमेश्वर बहुत ही उलझन में पड़ गए की उनसे कर लेना उचित होगा या इतने मनुष्यों की जान बचाना। वे कुछ विचार नहीं कर पाए अंत में उन्होंने इसकी सूचना पृथ्वीराज को अजमेर में दे दी। पृथ्वीराज चौहान ने मन ही मन ये सोचा की पिताजी ये कर क्या रहे है कभी सीधी ऊँगली से भी भला घी निकला है, अब पृथ्वीराज रातों रात मेवात की सीमा में जा पहुंचे उस समय सोमेश्वरराज चौहान सो रहे थे, इधर पृथ्वीराज ने दुश्मन की संख्या का पता लगा कर उनमे आक्रमण कर दिया और मुद्गल राय को पकड़ कर सोमेश्वर राज की सामने पेश किया उन्होंने उसे कैदखाने में डाल दिया। इस तरह से मेवात पर सोमेश्वर राज का अधिकार हो गया।


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